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Saturday, August 29, 2020

Muharram ul Haram 2020 | Is Muharram a happy festival? | What does Muharram mean? | मुहर्रमुल हराम  2020 | मुहर्रम का क्या मतलब है ?

Muharram ul Haram 2020 | Is Muharram a happy festival? | What does Muharram mean? | मुहर्रमुल हराम  2020 | मुहर्रम का क्या मतलब है ?


بِسۡمِ اللّٰہِ الرَّحۡمٰنِ الرَّحِیۡمِ

नाज़रीन, अस्सलामु  अलैकुम

इस्लाम में मुहर्रम के महीने की बहोत अहमियत है। अक्सर बेश्तर लोग मुहर्रम के बारे में पूछते रहते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कि मोहर्रम 2020 कब है?, मुहर्रम कब है?, मोहर्रम की पहली तारीख कब है?, 2020 में ताजिया कब है? इसके अलावा, What is Muharram celebrate for? , Is Muharram a happy festival? , Why do people beat themselves on Muharram? imam hussain story in hindi, how imam hussain was killed? imam hussain birthday, imam hussain karbala, imam hussain family tree, how did imam hussain as die?, imam hussain movie, hasan hussain story in hindi, imam hussain story in hindi, how imam hussain was killed?, imam hussain birthday,imam hussain karbala, imam hussain family tree, how did imam hussain as die? imam hussain movie,

Muharram ul Haram 2020

तो आज हम अपने इस ब्लॉग में इन्ही सारे सवालों के जवाब देंगे।  जैसे कि

Why we do celebrate Muharram?

What does Muharram mean?

What date is Muharram?

Is Muharram a happy festival?


तो दोस्तों, जैसा कि मैंने पहले कहा कि इस्लाम में मुहर्रम कि बहोत अहमियत हैं।

"मुहर्रम" नाम "हराम" लफ्ज़ से लिया गया है जिसका मतलब है कि ममनूअ ( यानि मना किया हुआ ) या नाक़ाबिले तस्खीर ( जिसे कोई हरा नहीं सकता ) क्योंकि इस महीने के दौरान किसी भी किसी भी क़िस्म कि गारत गिरी , जंग , बेहुरमती , वगैरा सब हराम है।


सब से पहले ये जान लें कि सभी धर्मो कि तरह इस्लामी कलैंडर में भी बारह महीने होते है। जिनमें से पहला मुहर्रम का महीना होता है।


अल्लाह तबारक ताला क़ुरान में इरशाद फरमाता ह।

बेशक अल्लाह के नज़दीक महीनो कि गिनती एक साल में बारह है। और अल्लाह कि किताब में जब से उस ने आसमान और ज़मीन बनाए उन में से चार हुरमत वाले महीने है। ये सीधा दीन ह।  तो इन महीनो में अपनी जान पर ज़ुल्म कर।

सूरह तौबा आयात 36


दर असल मक्का और उस के आस पास के लोगो में मुहम्मद स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के आने से पहले ही से ये रिवाज क़ायम था कि इस महीने को लोग बहोत मुक़द्दस ताबीर करते। और इसे एक बरकत वाले महीने से तस्बीह देते।  और अल्लाह ने भी क़ुरान में इसे इस्लामी महीनो में चार मुक़द्दस महीनो में शामिल किया ह।  जिसका ज़िक्र हमने ऊपर क़ुरान कि आयात से किया ह।


मुहर्रम न सिर्फ मुक़द्दस है, बल्कि इसे अल्लाह का महीना भी माना जाता ह। मुस्लिम शरीफ कि हदीस है, कि "आप स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि रमजान के बाद सब से बेहतर रोज़े मुहर्रम उल हराम के है।" इससे ये बात भी समझी जा सकती हैं कि मुहर्रम के महीने को अल्लाह ने बहोत अहमियत बक्शी है , और उसे अपने नाम के साथ रखने का एज़ाज़ दिया है। साथ इस महीने में रोज़े रखने को रमजान के रोज़ों के साथ तस्बीह देना इस बात का सबूत है कि इसकी अहमियत बहोत ही खास है।


दर हक़ीक़त  मुहर्रम के महीने के दौरान एक खास दिन होता है जिसम रोज़ा रखने लिए तालीम दी जाती है। जिसे हम यौमे आशूरा कहते हैं, ये मुहर्रम कि १० तारीख को मनाया जाता ह। जैसा मैंने पहले भी कहा है कि मुहम्मद स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के आने से पहले ही से ये बड़ी बरकत वाला महीना माना जाता है, और इस्लाम के जलवा फ़िगन होने से पहले भी लोग इस महीने कि १० तारीख को रोज़े का एहतेमाम करते थे। बुखारी व मुस्लिम शरीफ कि हदीस है कि हज़रात इब्न अब्बास रज़ि अल्लाह ताला अन्हुमा से रिवायत है कि जब मुहम्मद स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम मदीने में आए और यहूदियों को अशुरा के दिन रोज़ा रखते देखा तो आप स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने पुछा तुम लोग आज रोज़ा क्यों रखते हो? तो उन्होंने जवाब दिया, “यह एक अच्छा दिन है; और ये वो दिन है जब अल्लाह ने बानी इसराइल कि क़ौम को दुश्मनो से निजात दी। और फिर हज़रात मूसा अलैहिस्सलम ने इस दिन रोज़ा रक्खा। तब आप मुहम्मद स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि हम मूसा के तुम से ज़्यादा क़रीब हैं।  लेहाज़ा आप ने खुद भी रोज़ा रक्खा और सहाबा रिज़वानुल्लाहे ताला अजमईन को भी तलक़ीन फ़रमाई। 


यहाँ एक बात और ध्यान देना ज़रूरी है कि रमज़ानुल मुबारक के रोज़े जब फ़र्ज़ नहीं हुए थे , तो आप स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम मुहर्रम ही का रोज़ा रखने कि तलक़ीन कि यहाँ तक कि बगैर किसी उज़्र शरई कोई इसे न छोड़त।  मुस्लिम शरीफ कि हदीस है कि  उम्मुल मोमेनीन हज़रात आयेशा सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाह अन्हा से रिव्यात है कि जब रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हुए तो आशूरा का रोज़ा नफिल क़रार दिया गया कि अगर कोई न भी रक्खे तो कोई गुनाह नहीं। एक बात और इब्न अब्बास रज़ि अल्लाह ताला अन्हुमा से रिवायत है आप स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि यौमे आशूरा का रोज़ा रक्खो और इसके एक दिन पहले या बाद में भी रोज़ा रक्खो ताकि यहूदियों से मुशाबेहत न हो। ये ही वजह है कि मुसलमान 9वी और 10वि  या फिर 10वी और 11वी तारिख का रोज़ा रखते हैं।

सही मुस्लिम  2666


आम तौर पर रोज़े के बहोत से इनामात है। अल्लाह फरमाता है कि आदम का हर अमल उसके खुद के लिए हैं सिवा रोज़े के कि ये सिर्फ मेरे लिए हैं। और इसका बदला भी मैं खास दूंगा।


आप स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने मुहर्रम के रोज़े कि कुछ फ़ज़िलतें भी बयां कि है कि मैं अल्लाह से उम्मीद रखता ही कि अल्लाह अरफ़े के रोज़े कि फ़ज़ीलत से पिछले और आने वाले साल के गुनाह माफ़ फ़रमा।आप स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने मुहर्रम के रोज़े कि कुछ फ़ज़िलतें भी बयां कि है कि मैं अल्लाह से उम्मीद रखता ही कि अल्लाह अरफ़े के रोज़े कि फ़ज़ीलत से पिछले और आने वाले साल के गुनाह माफ़ फ़रमा। एक और हदीस में है  आप स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि यौमे आशूरा का रोज़ा पिछले और अगले साल के गुनाहो का कफ़्फ़ारा है

सही मुलिम 2747


Why we do celebrate Muharram?

आइये अब देखते है कि और कोनसी वजह जो इसे इतना खास बनती है।

 
10 मुहर्रम को हज़रात आदम अलैहिस्सलम कि तौबा क़बूल हुई।
10 मुहर्रम को हज़रात मूसा अलैहिस्सलाम कि दुआ क़बूलस हु।
10 मुहर्रम को हज़रात इसा अलैहिस्सलाम आसमान पर उठा लिए गए।
10 मुहर्रम को ही हज़रात यूनुस अलैहिस्सलाम को मछली ने पेट से बहार निकला।
10 मुहर्रम को हज़रात मूसा अलैहिस्सलाम कि कश्ती तूफ़ान से किनारे लगी।
10 मुहर्रम को ही हज़रात इब्राहीम अलैहिस्सलम आतिशे नमरूद से बहार निकले।
10 मुहर्रम को ही हज़रात अय्यूब अलैहिस्सलाम को कीड़े से निजात मिली।
10 मुहर्रम को ही क़यामत भी क़ायम होगी।

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ज़िक्रे मुहर्रम हो और ज़िक्रे हुसैन न हो। खुदा करे कि हमारे मुँह में ऐसी ज़बान ना हो।

दोस्तों अब वो बात जो इस महीने को और भी ज़्यदा हुरमत वाला बनती है कि इसी दिन हमारे प्यारे आक़ा स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के सबसे प्यारे नवासे हज़रात इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में अपने आप को क़ुर्बान करदिया और अपने नाना के दीन बेहुरमती से बचा लिय। 

इसी दिन हज़रात इमाम हुसैन अपने पुरे कुनबे के साथ जिस कि तादाद ७२ थी हक़ व इंसाफ को ज़िंदा रखने के लिए। अपने नाना जान स्वल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के दीन को पामाल होने से बचने के लिए यज़ीदी फ़ौज के आगे पहाड़ बन के खड़े होगये। यहाँ तक कि अपना सब कुछ क़ुरबान करदिया मगर यज़ीद पलीद के सामने घुटने न टेके और नहीं उसकी बैत क़बूल की।

 
दोस्तों बड़ा ही दर्द भरा वाक़िया है आप हज़रात इसे हर साल सुनते हो की कैसे यज़ीद ने और कूफ़े के लोगो ने आप हुसैन रज़ि अल्लाह अन्हुमा को धोका दिया और कर्बला में बुला कर शहीद कर दिया।
 
जब तक ये दुनिया क़ायम रहेगी तब तक हुसैन हर इंसान के दिल में ज़िंदा रहेगा।
 
किसी शायर ने कहा है
क़त्ले हुसैन असल में मार्गे यज़ीद है।  इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद।

और हज़रात ख्वाजा मोईनुद्दीन रहमत उल्लाह अलैहि ने ये भी कहा है की

शाह अस्त हुसैन।  बादशाह अस्त हुसैन। सर दाद न दाद दर दस्ते यज़ीद। हक़्क़ा की बिना ला इलाहा अस्त हुसैन।

दोस्तों हमे भी चाहिए की इस महीने की हुरमत का ख्याल रक्खे। जिनि ज़्यादा हो सके इस में इबादत करें , सदक़ा, खैरात करें। आशूरा का रोज़ा रख्ख। अल्लाह हम सब को अमल की तौफ़ीक़ अता करें अमीन 


Muharram ul Haram 2020 | Is Muharram a happy festival? | What does Muharram mean? | मुहर्रमुल हराम  2020 | मुहर्रम का क्या मतलब है ?

Naazareen, Assalaamu Alaikum Islaam mein muharram ke maheene kee bahot ahamiyat hai. aksar va beshtar log muharram ke baare mein poochhate rahate hain. Aksar poochhe jaane vaale savaal

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To doston, jaisa ki mainne pahale kaha ki islaam mein muharram ki bahot ahamiyat hain.

"Muharram" naam "haraam" laphz se liya gaya hai jisaka matalab hai ki mamanoo ( yaani mana kiya hua ) ya naaqaabile taskheer ( jise koee hara nahin sakata ) kyonki is maheene ke dauraan kisee bhee kisee bhee qism ki gaarat giree , jang , behuramatee , vagaira sab haraam hai. Sab se pahale ye jaan len ki sabhee dharmo ki tarah islaamee kalaindar mein bhee baarah maheene hote hai. jinamen se pahala muharram ka maheena hota hai. Allaah tabaarak taala quraan mein irashaad pharamaata ha. Beshak allaah ke nazadeek maheeno ki ginatee ek saal mein baarah hai. aur allaah ki kitaab mein jab se us ne aasamaan aur zameen banae un mein se chaar huramat vaale maheene hai. ye seedha deen ha. to in maheeno mein apanee jaan par zulm na kar. soorah tauba aayaat na 36 Dar asal makka aur us ke aas paas ke logo mein muhammad svallallaaho alaihi vasallam ke aane se pahale hee se ye rivaaj qaayam tha ki is maheene ko log bahot muqaddas taabeer karate. aur ise ek barakat vaale maheene se tasbeeh dete. aur allaah ne bhee quraan mein ise islaamee maheeno mein chaar muqaddas maheeno mein shaamil kiya ha. jisaka zikr hamane oopar quraan ki aayaat se kiya ha. Muharram na sirph muqaddas hai, balki ise allaah ka maheena bhee maana jaata ha. muslim shareeph ki hadees hai, ki "aap svallallaaho alaihi vasallam ne irashaad faramaaya ki ramajaan ke baad sab se behatar roze muharram ul haraam ke hai." isase ye baat bhee samajhee ja sakatee hain ki muharram ke maheene ko allaah ne bahot ahamiyat bakshee hai , aur use apane naam ke saath rakhane ka ezaaz diya hai. saath is maheene mein roze rakhane ko ramajaan ke rozon ke saath tasbeeh dena is baat ka saboot hai ki isakee ahamiyat bahot hee khaas hai. Dar haqeeqat muharram ke maheene ke dauraan ek khaas din hota hai jisam roza rakhane lie taaleem dee jaatee hai. jise ham yaume aashoora kahate hain, ye muharram ki 10 taareekh ko manaaya jaata ha. jaisa mainne pahale bhee kaha hai ki muhammad svallallaaho alaihi vasallam ke aane se pahale hee se ye badee barakat vaala maheena maana jaata hai, aur islaam ke jalava figan hone se pahale bhee log is maheene ki 10 taareekh ko roze ka ehatemaam karate the. bukhaaree va muslim shareeph ki hadees hai ki hazaraat ibn abbaas razi allaah taala anhuma se rivaayat hai ki jab muhammad svallallaaho alaihi vasallam madeene mein aae aur yahoodiyon ko ashura ke din roza rakhate dekha to aap svallallaaho alaihi vasallam ne puchha tum log aaj roza kyon rakhate ho? to unhonne javaab diya, “yah ek achchha din hai; aur ye vo din hai jab allaah ne baanee isarail ki qaum ko dushmano se nijaat dee. aur phir hazaraat moosa alaihissalam ne is din roza rakkha. tab aap muhammad svallallaaho alaihi vasallam ne irashaad faramaaya ki ham moosa ke tum se zyaada qareeb hain. lehaaza aap ne khud bhee roza rakkha aur sahaaba rizavaanullaahe taala ajameen ko bhee talaqeen faramaee. Yahaan ek baat aur dhyaan dena zarooree hai ki ramazaanul mubaarak ke roze jab farz nahin hue the , to aap svallallaaho alaihi vasallam muharram hee ka roza rakhane ki talaqeen ki yahaan tak ki bagair kisee uzr sharee koee ise na chhodat. muslim shareeph ki hadees hai ki ummul momeneen Hazaraat aayesha siddeeqa razi allaah anha se rivyaat hai ki jab ramazaan ke roze farz hue to aashoora ka roza naphil qaraar diya gaya ki agar koee na bhee rakkhe to koee gunaah nahin. ek baat aur ibn abbaas razi allaah taala anhuma se rivaayat hai aap svallallaaho alaihi vasallam ne faramaaya ki yaume aashoora ka roza rakkho aur isake ek din pahale ya baad mein bhee roza rakkho taaki yahoodiyon se mushaabehat na ho. ye hee vajah hai ki musalamaan 9vee aur 10vi ya phir 10vee aur 11vee taarikh ka roza rakhate hain. sahee muslim 2666 Aam taur par roze ke bahot se inaamaat hai. allaah pharamaata hai ki aadam ka har amal usake khud ke lie hain siva roze ke ki ye sirph mere lie hain. aur isaka badala bhee main khaas doonga. Aap svallallaaho alaihi vasallam ne muharram ke roze ki kuchh fazilaten bhee bayaan ki hai ki main allaah se ummeed rakhata hee ki allaah arafe ke roze ki fazeelat se pichhale aur aane vaale saal ke gunaah maaf farama.aap svallallaaho alaihi vasallam ne muharram ke roze ki kuchh fazilaten bhee bayaan ki hai ki main allaah se ummeed rakhata hee ki allaah arafe ke roze ki fazeelat se pichhale aur aane vaale saal ke gunaah maaf farama. ek aur hadees mein hai aap svallallaaho alaihi vasallam ne faramaaya ki yaume aashoora ka roza pichhale aur agale saal ke gunaaho ka kaffaara hai sahee mulim 2747

Why we do celebrate Muharram?


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Zikre muharram ho aur zikre husain na ho. khuda kare ki hamaare munh mein aisee zabaan na ho.

Doston ab vo baat jo is maheene ko aur bhee zyada huramat vaala banatee hai ki isee din hamaare pyaare aaqa svallallaaho alaihi vasallam ke sabase pyaare navaase hazaraat imaam husain ne karbala ke maidaan mein apane aap ko qurbaan karadiya aur apane naana ke deen behuramatee se bacha liy.
Isee din hazaraat imaam husain apane pure kunabe ke saath jis ki taadaad 72 thee haq va insaaph ko zinda rakhane ke lie. apane naana jaan svallallaaho alaihi vasallam ke deen ko paamaal hone se bachane ke lie yazeedee fauj ke aage pahaad ban ke khade hogaye. yahaan tak ki apana sab kuchh qurabaan karadiya magar yazeed paleed ke saamane ghutane na teke aur nahin usakee bait qabool kee. Doston bada hee dard bhara vaaqiya hai aap hazaraat ise har saal sunate ho kee kaise yazeed ne aur koofe ke logo ne aap husain razi allaah anhuma ko dhoka diya aur karbala mein bula kar shaheed kar diya. Jab tak ye duniya qaayam rahegee tab tak husain har insaan ke dil mein zinda rahega. kisee shaayar ne kaha hai Qatle husain asal mein maarge yazeed hai. Islaam zinda hota hai har karbala ke baad. Aur Hazaraat Khvaaja Moeenuddeen Rahamat ullaah alaihi ne ye bhee kaha hai kee shaah ast husain. baadashaah ast husain. sar daad na daad dar daste yazeed. haqqa kee bina la ilaaha ast husain. doston hame bhee chaahie kee is maheene kee huramat ka khyaal rakkhe. jini zyaada ho sake is mein ibaadat karen , sadaqa, khairaat karen. aashoora ka roza rakhkh. allaah ham sab ko amal kee taufeeq ata karen ameen


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Likhne me bahot mashaqqat lagti hai agar koi galati dekhe to please islah ki niyyat se comment me zarur batae please

Pasand aane ki surat me dost o ahebab ko bhi share Karen, sath  humare YouTube Channel Islamic Wonders ko bhi zarur visit kare aur subscribe kare.

Isi ke sath ab roukhsat hote hain fir mulaqat hogi ek nay Topic ke sath Allah Hafiz and Jazak Allah

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